Wednesday, June 22, 2011

Translated poems (You and me)

मै और तुम 

 जैसे छोटी नदियों का  समावेश होता है  बड़ी नदियों में
और बड़ी नदियों का सागर में
जैसे वायु  का समावेश होता है पुष्पों की सुगंध में
और पुष्पों का प्रेमियों में 
प्रकृति की हर वस्तु का समावेश होता है एक दूसरे में
तो मेरा और तुम्हारा क्यूँ नहीं?
-अशोक भार्गव की अंग्रेजी कविता 'यू एंड मी' से अनुवादित
 

Translated poems (Soft Touch)

सौम्य स्पर्श 

यदि तुम्हें मुझसे प्रेम करने की अभिलाषा है
तो मुझे स्वीकार करो
यदि तुम मुझपर विश्वास करना चाहती हो 
तो करो, बिना किसी तर्क के
 यदि तुम मुझे प्रेम-स्पर्श देना चाहती हो 
तो स्पर्श करो मुझे अपने नेत्रों से 
बिना प्रश्न किये
क्यूंकि
एक दिन मेरा प्रेम प्रकट होगा 
मेरा आवेग उभरेगा
मेरा हृदय समृद्ध हो जायेगा
मेरा उत्साह बढेगा तुम्हारे लिए
परन्तु
यदि तुम नहीं कर सकतीं मेरी प्रतीक्षा
तो बिना दुविधा 
मुझसे विदा लो
क्यूंकि जब भी में इच्छुक रहूँगा 
सृजन कर सकता हूँ तुम्हारा  
-अशोक भार्गव की कविता ' सोफ्ट टच' से अनुवादित 
        

Tuesday, June 21, 2011

Translated poems (Chaitanya)

चैतन्य
श्चिम की ओर दृष्टिगोचर
मरीन डॉइव  पर
खुले हुए हस्त समर्थित करते हुए
बृहत लबादे को-तुम वहीँ खड़े हो हे चैतन्य
क्षितिज पर दृष्टि रखे हुए
अविचलित
प्रतीक्षित
भविष्यवाणी करते हुए एक नवीनतम घटना के आगमन की 
यहाँ घुमावदार नदियों के तट नहीं 
न ही अस्थिर बंगाल के बाघ 
न ही है यहाँ वर्षा का जल है जो तुम्हारे पाँव पखार सके
मात्र श्वेत हिम है, अतिशीत करने के लिए तुम्हारे प्राणों को

कालिमा में वर्षा की बूंदे
अनुकरण  करतीं जुगनुओं का
पूर्ण करतीं रिक्तता को
प्रदर्शित करते हुए एक पाषाण ह्रदय 
धडकनों से वर्जित
क्या तुम देख सकते हो चैतन्य 
अपने मार्ग की दुर्गमता को
मुझे लगता है तुम जानते हो
विशाल 
जो में व्यक्त कर रहा हूँ

क पाषाण धर्मादेश
एक नवीन नास्तिकता
अपारदर्शी पर स्पष्ट
साधारण पर जटिल
उथला पर गहरा, लेन-देन
हल्का या गाड़ा, दुःख या प्रसन्नता
मतभेद या उड़ान
एक मात्र कोशिका
से लेकर पृथ्वी के ढेर तक
है जीवन यात्रा

हे चैतन्य उठो
तुम्हारी पाषाण मुस्कराहट असमंजित है
अनुपयुक्त   
-अशोक भार्गव की अंग्रेजी कविता 'चैतन्य' से अनुवादित 

   
 
 
 
 
  

  
 
 

Monday, June 20, 2011

Translated Poems (Rekindled)

 प्रज्वलित 
 बज रहा है धानो का गीत आज रात्रि,
और समीप है आखेटक के लिए प्रजवलित चन्द्र
स्नान कर उसकी आभा में प्रदर्शित करते हुए
आदि कालीन नृत्य उस सभा का
जहाँ कृषक अर्पण करता है जो बोया था उसने धरा और रोपण की देवी को

में श्रवण करता हूँ उनकी शांत मंत्रध्वानियाँ और गीतों को
कथा कारों की अंतिम कथा
असंस्कृत आगमन के साथ
ताल में झूमते शून्य बना गतीवर्धित
में देखता हूँ उनकी प्रकाश्पुन्जित एवं जीर्ण काया
और ज्वाला जो अपनी ही श्वासों में विलुप्त हो चुकी है 

ये  अधार्मिक रिवाज़, आरंभिक आवेश स्पर्श कर जाते हैं मुझे स्मृतियों में
नहीं कोमलता से नहीं
एक कवि की वाणी को जो भीतर है मेरे 

यह  धनो का गीत जो बज रहा है आज रात्र
दूर नहीं है किसी कृषक के चन्द्र से 
आलिंगन में बाँध लेगा ये मेरे पौरुष को
और वे सुनेंगे मुझे चीत्कारते हुए मेरी आखेट से भरी कवितायेँ
 -
(पंगासिनान के कवि संतिअगो विल्लाफनिया की कविता 'रिकिनडलड ' से अनुवादित)


 


Tuesday, May 24, 2011

Senyru

Long nights
my soul
Wandering

The sky sprinkles
nectar
I pine for your touch

Dreams in
drowsy eyes
scatter like pearls as eyelashes unkiss

Bess, unkissed
dead
for her highwayman

We grew together one
today
he is a man, I, a woman

Bubblegum
smells like
childhood

I plunge
into
your stealth world

Your voice
my origin
mine, your language

On my way
to God (pilgrimage)
I find myself

with lost youth
childhood and tattered chastity
she lies hivied on a hammock

thirty years
unliberated, celled
for someone's sin

Osama: kill everyone
everybody
is your foe

Wide emerald eyes
shocked at a click
in a land with smell of red mud: Afganistan





Sunday, May 15, 2011

Love Senyru

Hold Geeta
closest
my cuticles feel yours

He emerges
with crimson numbers
on facebook

I call
he says, 'hello'
I live for one more day

Eyes
in tears
with you in heart

Your mother, I am
My mother, you
I need your embrace
even after you hurt me

He holds a book
I kiss it
Kiss him

Immersed in
your embrace
my chaste heart

Long conversation
with you
You, on my mobile

Monday, April 25, 2011

Translated poems: Santiago B Villafania

स्वदेश

मैंने नापा है तुम्हारी सुडौलता को
कभी टकटकी बांधकर कभी एक दृष्टी से यूँ ही
हर उभार और आलेख को
चाहे वो  पहाड़  हों या पठार
मैंने जीते हैं

तुम्हारे क्षितिज का परागमन किया है मैंने, एक झपक में
अधीन कर चलाता हुआ चारों दिशाओं को
चौकड़ियाँ भरता हुआ मैं तुम्हारे हरे अस्तबलों में

पार किया है मैंने तुम्हारी नदियों को
उस पुराने पशु की पीठ पर
और गाँव देवियों को तुम्हारे नाम की महत्ता और उदगम के रहस्य बताये हैं
स्मृति भरी है मेरी तुम्हारी लोक एवं पौराणिक कथाओं से
जिन्होंने मिथकीय बनाया है प्रेम प्रसंगों और जीवनियों को
तुम्हारी पीढ़ियों  की, जैसे की वे हज़ारों वर्षों पहले लिखी गयी हों

स्वदेश, तुम्हारे पुनर्जागरण और स्वर्ण युग को रंगीन बनाने के लिए
और अदितीय करने के लिए ही
मैंने अब तक अपनी श्वाशों को चलायमान रखा है
ताकि, तुम्हारा इतिहास सुना जाये
मैंने मिथ्या पूर्ण व्यक्तव्य दियें हैं,
अपने ही लोगों के मध्य
जो खोते जा रहे हैं
अपनी जिव्हा का नमक
और अपनी विरासत

तुम मेरी पकड़ में हों कोबोलन (क्षेत्र पंगासिनान के रहिवासी)
मेरी कल्पना के भवन में
मेरे स्वदेश हों तुम
यहीं मेरे हृदय क्षेत्र में
जब स्वर धड़कते हैं जैसे की जंगली कबूतरों की श्वास रोक दी गयी हों
तब ये शब्द मद की भाँती बहते हैं 
जैसे रक्त बहता है मेरी धमनियों में

पुनः मुझे सुनने दो बांसों से निकले वो गीत
किसी प्रेमी की श्रृंगार से भरी कवितायेँ
हाँ, पुनः सुनने हैं मुझे वे मंत्र और मंत्रध्वानियाँ
और पहाड़ों पर बैठी निस्तभता को भी
उस कालिमा में विलुप्त होंने से पहले
उस भयावह उड़ान को भरने से पहले

उठो कोबोलन और मेरे शब्दों में से बोलो
अपने शब्दों को अधरों से छु कर उन्हें पुनर्जीवित कर दो
तब तक, जब तक तुम्हारे वंशज उन्हें सुन न लें
सुनो उनके अंतर्मन की भाषा
और बोलो
मेरे विलुप्त होने से पहले

-संतिअगो विल्लाफनिया की कविता 'काउंट्री ऑफ़ माय ओन' से अनुवादित